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पहले से ही अपनी विवादित पॉलिसी के चलते घिरते नज़र आ रहे इंस्टेंट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म व्हाट्सएप (WhatsApp) ने अब एक बड़ा क़दम उठाया है। फ़ेसबुक (Facebook) के मालिकाना हक़ वाली WhatsApp ने अब दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) में नए नियमों के ख़िलाफ़ एक मुक़दमा दायर किया है।

असल में व्हाट्सएप (WhatsApp) का कहना है कि अगर ये नियम लागू हुए तो उससे यूज़र्स की प्राइवेसी पर सीधा असर पड़ेगा। सूत्रों की मानें तो व्हाट्सएप (WhatsApp) ने दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) में सरकार के नए नियम को निजता के अधिकार का हनन ठहराने की अपील की है।

असल में सरकार के नए नियमों में कंपनी के साथ जिस बात को लेकर सबसे अधिक पेंच फँस रहा है, वो है ट्रेसेब्लिटी (Traceability) को लेकर बनाए गए नियम पर।

व्हाट्सएप (WhatsApp) के प्रवक्ता ने इस बारे में कहा है कि कंपनी के मैसेज एन्क्रिप्ट होते हैं और ऐसे में यूज़र्स की चैट आदि को ट्रेस करने का मतलब है कि सीधे तौर पर उनके मैसेज पर नजर रखना। और ज़ाहिर है इससे यूजर्स की प्राइवेसी लगभग ख़त्म सी हो जाएगी।

क्या है ट्रेसेब्लिटी का नियम?

आपको याद होगा सरकार ने फ़रवरी में Guidelines for Intermediaries and Digital Media Ethics Code Rules, 2021 करके सोशल मीडिया कंपनियों के लिए नए नियम पेश किए थे।

इन नई गाइडलाइंस के अनुसार WhatsApp जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मो को नए ट्रेसेब्लिटी (Traceability) नियमों का भी पालन करने के लिए कहा गया है।

WhatsApp-Traceability

इस ट्रेसेब्लिटी नियम का मतलब है कि देश की सुरक्षा और संप्रभुता और अन्य कई गंभीर तरह के अपराधों से संबंधित पोस्ट आदि के बारे में कुछ चुनिंदा जानकारी जैसे ‘उस पोस्ट की शुरुआत किसने की?’, आदि माँगे जाने पर प्लेटफ़ॉर्म को सरकार को ये सारी जानकारी बतानी होंगी।

लेकिन अब तमाम मैसेजिंग ऐप जैसे WhatsApp, Telegram, Signal यूज़र्स की प्राइवेसी सुनिश्चित करने के लिए एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन के इस्तेमाल का दावा करते हैं। एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन का मतलब कि प्लेटफ़ॉर्म को चलाने वाली कंपनी ख़ुद ये नहीं जान सकती कि कौन सा यूज़र किसको, कब और क्या मैसेज कर रहा है।

इसलिए व्हाट्सएप ने दिल्ली हाईकोर्ट में दलील दी है यह नियम लागू होने के बाद कंपनी को मेसेज भेजने वाले के साथ-साथ रिसीवर का भी एन्क्रिप्शन तोड़ना होगा।

साथ ही इस अपील में कहा गया है कि मैसेज को ट्रेस करने का प्रावधान असंवैधानिक है और सुप्रीम कोर्ट द्वारा रेखांकित किए गए भारत के नागरिकों की निजता के अधिकार को कमजोर करता है।

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