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बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने इनोवेटर्स ग्रोथ प्लेटफॉर्म (IGP) पर लिस्टिंग नियमों में ढील देते हुए भारतीय स्टार्टअप्स के लिए इनिशियल पब्लिक ऑफ़रिंग (IPO) की प्रक्रिया को सरल बनाने का फैसला किया है।

आप सोच रहें होंगें कि जिस IGP के नियमों में ढील देने की अटकलें लगाई जा रही हैं, वो आख़िर है क्या? बता दें IGP को पहले इन्स्टिटूशनलाइज्ड ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म (ITP) के नाम से भी जाना जाता था।भारत सरकार द्वारा 2015 में इसको शुरू किया गया था ताकि स्टार्टअप को पब्लिक ट्रेडिंग के लिए खुद को इन-लिस्ट करने की इजाज़त मिल सके।

लेकिन अब ऐसा बताया जा रहा है कि IGP के मौजूदा नियमों को देखते हुए SEBI को भारतीय स्टार्टअप्स की ओर से लिस्टिंग को लेकर जो एक उदासीन सी कही जा सकने वाली प्रतिक्रिया देखने को मिली है, उसके चलते ही SEBI 2018 से अपने नियमों या कहें तो मानदंडों में ढील दे रहा है।

ईकोनॉमिक टाइम्स की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले से संबंधित अधिकारियों ने बताया है कि SEBI 25 मार्च को अपनी बैठक में डिस्क्लोज़र स्टैंडर्ड में सुधार और समयावधि कम करने के लिए कंपनियों की डी-लिस्टिंग को लेकर स्वतंत्र निदेशकों (Independent Directors) की बड़ी भूमिका को अहम बना सकता है।

इसके साथ ही कॉरपोरेट शासन को मजबूत करने और अनुपालन बोझ को कम करने के लिए बोर्ड अपने लिस्टिंग दायित्वों और प्रकटीकरण आवश्यकताओं (LODR) में भी संशोधन कर सकता है।

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इसके साथ ही SEBI ने एक डिस्कशन लेटर में ये भी सिफारिश की है कि कंपनियों को सब्स्क्रिप्शन जारी करने से पहले एंकर निवेशकों को विवेकाधीन आधार पर 60% तक का इशू साइज़ आवंटित करने की अनुमति दी जाए। इसके साथ ही ये सेगुलेटर खुले प्रस्तावों को 25% से 49% तक ट्रिगर करने के लिए सीमा भी बढ़ा सकता है।

SEBI बैठक में किन प्रस्तावों को पेश कर सकता है; (संभावित)

एक स्टार्टअप में 25% या इससे अधिक की हिस्सेदारी रखने वाले निवेशकों के लिए लिस्टिंग करने से पहले अनिवार्य शेयरधारिता की अवधि दो साल के बजाय 1 साल की जा सकती है।

सार्वजनिक मुद्दों के दौरान एंकर निवेशकों को शेयरों के अधिक आवंटन की सिफारिश की जा सकती है।

विशेष अधिकार जैसे बोर्ड सीटें और पुष्टिकारक वोटिंग अधिकार, प्रमोटर्स, मौजूदा संस्थागत निवेशक जो 10% से अधिक हिस्सेदारी रखते हों, उनको लेकर अहम फ़ैसले।

IGP में लिस्ट होने वाली कंपनियों को प्रमोटर्स के बीच वोटिंग आधिकारों की प्राथमिकता को चुनने का अधिकार दिया जा सकता है।

इसके पहले SEBI 2019 में भी अपने नियमों में तमाम तरीक़े के बदलाव कर चुका है। लेकिन अब देखना ये है कि क्या आने वाली समय में SEBI IPO दायर करने के नियमों में स्टार्टअप्स को इतनी सहूलियत दे पाएगा कि इस क्षेत्र आ नज़ारा बदलता दिखे?