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सप्रीम कोर्ट ने 15 दिसंबर को Ola और Uber को लेकर दायर किए गए आरोप पत्र ख़ारिच कर दिए। दरसल इस आरोप पत्र में था कि इन कैब सेवा प्रदातों ने विरोधी प्रतिस्पर्धात्मक प्रथाओं को शुरू किया और इन कंपनियों के ड्राइवर एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से काम करते थे।

दरसल अदालत ने अपने इस आदेश में इस बात को ख़ारिच कर दिया है कि ड्राइवर किसी भी तरह इन कैब एग्रीगेटरों से वसूले जाने वाले दामों में हेरफेर कर रहे थे।

देखा जाए तो देश की शीर्ष अदालत ने प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) के आदेश को बरकरार रखा। आपको बता दें ये फैसला जस्टिस आर.एफ. नरीमन, के.एम. जोसेफ, और कृष्ण मुरारी की तीन-न्यायाधीश पीठ द्वारा दिया गया।

LIVE LAW नामक वेबसाइट के मुताबिक़ तीन-न्यायाधीशों की इस पीठ ने यह भी पाया कि मामले की पैरवी कर रहे समीर अग्रवाल के पास इस संबंध में CCI के पास जाने का कोई लोकल स्टैंड नहीं था।

दरसल समीर अग्रवाल ने CCI पर आरोप लगाया था कि कैब एग्रीगेटर्स का एल्गोरिथ्म मूल्य निर्धारण प्रणाली को लेकर एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करने के चक्कर में व्यक्तिगत ड्राइवरों की स्वतंत्रता को छीन लेते हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इन एल्गोरिथम के चलते मूल्य निर्धारण को लेकर एग्रीगेटरों ही फ़ैसला करते हैं, जो अधिनियम की धारा 3 के प्रावधान का उल्लंघन है।

आपको बता दें असल में CCI अधिनियम की धारा 3 के तहत उद्यमों या व्यक्ति या व्यक्तियों के संघ का कोई भी  सप्लाई, डिलीवरी, भंडारण, अधिग्रहण या माल के कंट्रोल या सेवाओं के प्रावधान के संबंध में किसी भी समझौते को नहीं करेगा। यह इसलिए ताकि भारत में प्रतिस्पर्धा को लेकर एक सराहनीय माहौल बनाया जा सके। और अगर ऐसी कोई डील की भी जाती है तो वह मान्य नहीं मानी जाएगी।

इस बीच दायर अपील की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट इस नतीजे पर पहुँचा कि इन कंपनियों के ड्राइवरों ने एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से काम किया और इस प्रकार सवारी प्रदाता कंपनियों को भी भारी राहत मिली।

इस बीच CCI का एक तर्क था कि कीमतें कई चीज़ों पर आधारित होती हैं। एल्गोरिथ्म ट्रैफ़िक भीड़, मांग, त्योहारों आदि सब को ध्यान में रख ही क़ीमत तय करता है। आपको बता दें अग्रवाल की अपील को NCLT ने भी खारिज कर दिया था।

इस बीच यह भी जानकारी दे दें कि न्यूनतम रिसेल रखरखाव संबंधी अन्य आरोप को भी खारिज कर दिया गया है क्योंकि ऐप-आधारित कैब सेवाओं के लिए कोई ‘रिसेल’ नहीं है।