दिल्ली विधानसभा चुनावों में अब बस महीना भर बाकी हैं और इस साल चुनावों के चलते सोशल मीडिया पर तमाम क़ानूनी रोकों और नई नीतियों के बाद भी राजनीतिक विज्ञापनों और कंटेंट में बढ़ोतरी की उम्मीद की जा रही है।

एक तरफ जहाँ माइक्रो-ब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म Twitter अक्टूबर में ही राजनीतिक विज्ञापन पर प्रतिबंध लगा चुका है, वहीं Google ने भी नियमों में कुछ ऐसे बदलाव जरुर किये हैं, जिनके चलते राजनीतिक दलों को अब अपने कैंपेन इत्यादि के लिए चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। 

साथ ही Bytedance के मालिकाना हक़ वाले TikTok ने भी हाल ही में राजनीतिक विज्ञापनों पर पूरी तरह से प्रतिबन्ध लगाने का ऐलान कर दिया है।

लेकिन इस सब कोशिशों के बाद भी फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि देश में राजनीतिक दलों द्वारा देश में सोशल मीडिया विज्ञापनों पर खर्च में कोई कमी नहीं आएगी।

ब्रांड सलाहकार हरीश बिजूर के अनुसार;

“राजनैतिक विज्ञापनों में खर्च को लेकर साल 2020 में कोई कमी दर्ज नहीं की जाएगी। दरसल राजनीतिक पार्टियों ने सोशल मीडिया कैंपेन का स्वाद चख़ लिया है। और इसी के चलते विज्ञापनों को कम करने के बजाए उन पर खर्चों का गुणात्मक बंटवारा किया जाएगा।”

“राजनैतिक पार्टियाँ हमेशा ही प्लेटफार्मों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों में लूपहोल तलाश लेती हैं और इस बार भी ऐसा ही कुछ दिखाई पड़ सकता है।” 

इस बीच आपको बता दें Facebook की राजनीतिक विज्ञापन पारदर्शिता रिपोर्ट के अनुसार राजनीतिक दलों ने पिछले 90 दिनों में दिल्ली को टारगेट करते हुए कुल 74.88 लाख रुपये खर्च किए है। आम आदमी पार्टी के दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खिलाफ बना एक मॉक-पेज पल्टू आदमी पार्टी, इस अवधि के दौरान शीर्ष स्थान पर रहा, जिसके बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के आधिकारिक अकाउंट ने अपना स्थान बनाया।

इसके बाद My Delhi, My Pride नामक आम आदमी पार्टी (AAP) के समर्थन में विज्ञापन देने वाला पेज तीसरा सबसे ज्यादा ख़र्च करने वाला पेज बना।

आपको बता दें दिल्ली में 8 फरवरी को चुनाव होने हैं और ऐसे में अब राजनैतिक दलों के सोशल मीडिया का बजट और भी बढ़ता नज़र आ सकता है।

इस बीच हरियाणा विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के अभियान को मैनेज करने वाले और आम चुनावों के दौरान पार्टी के सोशल मीडिया कैंपेन सँभालने वाले, DesignBoxed के डायरेक्टर नरेश अरोड़ा के अनुसार;

“राजनीतिक दल अब प्रभावशाली लोगों को पैसे देकर उनसे ऑनलाइन कम्युनिटी बनवा कर भी अपना प्रचार करवाने लगे हैं। इससे वह सीधे प्लेटफ़ॉर्म पर खर्च किये बिना विज्ञापनों के जरिये अपने कैंपेन को फैला पा रहें है।”

“कंटेंट बनाना और उसको डिस्ट्रीब्यू करना काफी खर्चीला भी है, इसलिए कुछ राजनीतिक दलों ने अपनी ओर से ट्वीट पोस्ट करने के लिए लोगों को पेमेंट करने का भी विकल्प चुना है।”

आपको बता दें अक्सर विशेषज्ञों के ये माना है कि चुनावों के दौरान सोशल मीडिया से जुड़ा विज्ञापन खर्च आमतौर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म द्वारा जाहिर किये गये खर्च से कहीं अधिक होता है।

उदाहरण के लिए राजनीतिक दलों और सहयोगी कंपनियों ने आधिकारिक तौर पर 2019 में Facebook, Google और Twitter पर विज्ञापन देने के लिए लगभग 72 करोड़ रुपये खर्च किए, जो वास्तविक राशि अमेरिकी कंपनियों द्वारा जारी की गई पारदर्शिता रिपोर्टों के अनुसार कम से कम 3-4 गुना अधिक थी।

दरसल अब राजनैतिक दलों ने अपने संदेश और कैंपेन को अप्रत्यक्ष तौर पर फैलाने के लिए प्रभावशाली लोगों के इस्तेमाल का चलन शुरू किया है, जो सोशल मीडिया में अपने प्रशंसकों के बीच राजनैतिक दलों का अप्रत्यक्ष प्रचार करते नज़र आते हैं।

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